
ना बड़ी मूर्ति थी, ना भव्य पंडाल।
बस खेतों की मिट्टी, कुछ फूलों की माला, और दिलों में बसी श्रद्धा।
गाँव के बच्चे नंगे पाँव दौड़ते थे पीछे,
औरतें सिर पर कलश लिए, आँखों में आँसू और मुस्कान साथ लिए।
बुज़ुर्गों के चेहरे पर वो सुकून था, जैसे स्वर्ग यहीं उतर आया हो।
बारिश की बूँदें गिरती थीं, पर कोई नहीं रुका।
गणपति बाप्पा की विदाई थी,
और हर दिल कह रहा था — *”फिर आना बाप्पा, इसी खेत की राह पकड़कर।”*
ना पैसा था, ना शोरगुल।
बस एक सच्चा जज़्बा था,
जो आज भी मेरी यादों में गूंजता है।
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