
“छाया से चैतन्य तक”
“जब तक पुरखों को अर्पण न हो, देवी का आह्वान अधूरा है। पहले स्मृति, फिर उत्सव। पहले मौन, फिर मंगल।”
पितृ पक्ष में रसोई शांत होती है। न कोई नया स्वाद, न कोई चटख रंग। बस तांबे की थाली में कच्चा दूध, तिल, और गंगाजल। दादी कहती थीं, “जिन्होंने हमें जन्म दिया, उन्हें पहले भोजन दो। देवी बाद में आती हैं।”
हर सुबह तुलसी के पास पापा बैठते, आँखें बंद, होंठों पर नाम—जो मैंने कभी सुने नहीं। दादाजी के लिए चावल के पिंड, मौसी के लिए गुड़, और उस चाचा के लिए नमक, जिन्हें दाल में बस यही चाहिए था।
ये सिर्फ कर्मकांड नहीं था—ये स्मृति थी। हर निवाला, हर अर्पण, एक कहानी थी। एक ऐसा स्वाद, जो रसोई में नहीं, दिल में बसता है।
फिर आती है सर्वपितृ अमावस्या— एक दीपक जलता है, मोक्ष के लिए, शांति के लिए।
और जैसे ही वो दीपक बुझता है, हवा बदलती है। शंख बजता है, रंग लौटते हैं। पुरखे तृप्त होते हैं, आशीर्वाद बरसता है।
अब रसोई फिर से गुनगुनाती है। हल्दी लौटती है, मिर्च मुस्कुराती है। और उसी मौन से जन्म लेता है उत्सव—नवरात्रि।
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