साल 1998 की बात है। Lucknow की वो पुरानी गलियाँ, जहाँ हर मोड़ पर एक कहानी थी। हमारे घर के सामने वाले पंडाल में हर साल देवी की मूर्ति आती थी—गुलाबी साड़ी में, चाँदी की मुकुट पहने। पड़ोसी मिलकर सजावट करते, कोई फूल लाता, कोई लाइटें। गली में cricket चलता था, लेकिन जैसे ही आरती का समय होता, सब बैट छोड़कर दौड़ते थे—“माँ आ गई!”
शहर की सड़कों पर हलचल थी—
1. चौक से लेकर हजरतगंज तक, हर नुक्कड़ पर पंडाल बन रहे थे।
2. बिजली के तारों में रंगीन बल्ब लटक रहे थे, जैसे आसमान खुद रोशनी पहन रहा हो।
3. गली के बच्चे—हम सब—दिन में क्रिकेट खेलते, शाम को पंडाल में मदद करते।
4. पुराने दोस्त, जिनसे स्कूल में लड़ाई होती थी, अब साथ में फूल सजाते थे।
5. पड़ोसी—Sharma Aunty, Gupta Uncle, Mishra Ji—सब एक परिवार बन जाते थे।
Maa ने उस साल एक very well-known खास डिश बनाई थी—सिंघाड़े के आटे का हलवा। क्योंकि Navaratri का व्रत था, लेकिन स्वाद में कोई कमी नहीं। बगल वाली Sharma Aunty ने कहा था, “ये हलवा तो नवाबों के दस्तरख़ान में होना चाहिए!”
🏙️ Lucknow की बात ही अलग थी—नवाबों का शहर, लेकिन दिल सबका एक। पुराने दोस्त, मोहल्ले की हँसी, और वो हलवे की खुशबू जो पूरे पंडाल में फैल जाती थी।

🍽️ सिंघाड़े के आटे का हलवा:
सामग्री:
सिंघाड़े का आटा – 1 कप
देसी घी – 1/2 कप
पानी – 2 कप
चीनी – 3/4 कप
इलायची – 1/2 चम्मच
कटे हुए मेवे – बादाम, काजू, पिस्ता
विधि:
कढ़ाई में घी गरम करें, उसमें सिंघाड़े का आटा डालें और धीमी आँच पर सुनहरा होने तक भूनें।
अलग से पानी में चीनी घोल लें और उबालें।
अब चीनी का पानी धीरे-धीरे आटे में डालें, लगातार चलाते रहें ताकि गाठें न पड़ें।
इलायची और मेवे डालें।
जब हलवा घी छोड़ने लगे, तब समझिए तैयार है।
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