
पिछले साल मैंने माँ दुर्गा के मंदिर में एक
त्रिशूल पर नज़र डाली। वह साधारण लोहे का बना था, लेकिन उसकी आभा अद्भुत थी। पुजारी ने बताया कि त्रिशूल माँ दुर्गा की तीन शक्तियों—संकल्प, साहस और सम्पूर्णता—का प्रतीक है।
आरती के समय जब दीपक की लौ उस
त्रिशूल पर पड़ी, तो मुझे आत्मा तक यह संदेश महसूस हुआ कि दुर्गा केवल देवी नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर छिपी ताक़त का प्रतीक हैं।
उस रात की महाआरती में मेरे पास बैठा एक छोटा बच्चा बार-बार
त्रिशूल की ओर इशारा करके पूछ रहा था—“ये क्यों पकड़ती हैं माँ?” उसकी दादी ने मुस्कुराकर कहा—
“बेटा, त्रिशूल हमें सिखाता है कि माँ हर रुकावट को काट देती हैं। दुख हो, भय हो या नकारात्मकता—माँ का त्रिशूल सब मिटा देता है।”
उनकी ये बात सुनकर समझ आया कि पिछले नवरात्रि का मेरा असली अनुभव यही था—माँ का त्रिशूल सिर्फ एक शस्त्र नहीं, बल्कि जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की प्रेरणा है।
इस बार का संकल्प
अब जब नवरात्रि बस पाँच दिन दूर है, मैं सोचता हूँ—इस बार हर दिन त्रिशूल को याद करूँगा, और हर कठिनाई के सामने अपने भीतर की शक्ति को जगाऊँगा। माँ दुर्गा का यह पवित्र चिह्न अपना मार्गदर्शन बन जाए।![]()
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