
एक त्यौहार गया, दूसरा दस्तक दे रहा है—भक्ति का रंग कभी फीका नहीं पड़ता। गणपति बप्पा को विदाई देते हुए आँखें नम थीं, लेकिन दिल में एक नई उम्मीद थी। अब मन माता रानी के स्वागत को तैयार है।
नवरात्रि की रौनक धीरे-धीरे हर गली, हर घर में उतर रही है। कहीं गरबा की धुनें बज रही हैं, कहीं मंदिरों में सजावट शुरू हो चुकी है। त्यौहार बदला नहीं, बस रूप बदल गया है—भक्ति वही है, भाव नए हैं।
🏠 घरों में फिर से वही हलचल
- दीवारों पर नया रंग चढ़ रहा है, जैसे हर ईंट कह रही हो—”माँ आ रही हैं”
- रसोई में फिर से हलवे की खुशबू तैर रही है, जिसमें घी की गरमाहट और यादों की मिठास घुली है
- मंदिर में घंटियों की गूंज है, और अगरबत्ती की धुंआ सी बातों में श्रद्धा की महक है
बच्चे स्कूल से छुट्टी लेकर गरबा की प्रैक्टिस में जुटे हैं—पाँव थकते नहीं, ताल टूटती नहीं दादी पूजा की थाली सजा रही हैं—कुमकुम, अक्षत, फूल और वो पुरानी चांदी की घंटी माँ पुराने कपड़े निकाल रही हैं—हर लहंगा, हर दुपट्टा जैसे किसी कहानी का हिस्सा हो
हर चीज़ त्यौहार के स्वागत में झुक रही है—दीये भी, धागे भी, और दिल भी।
🌸 भावनाओं का संगम
गणपति की विदाई और नवरात्रि की तैयारी के बीच जो पल हैं, वो सिर्फ कैलेंडर के नहीं—वो दिल के हैं। ये वो समय है जब हम एक त्यौहार को विदा देते हैं, और दूसरे को गले लगाते हैं। भक्ति का ये सिलसिला कभी रुकता नहीं—बस बदलता है, खिलता है, और हर बार नया रूप लेता है।
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