बाज़ार की रौनक सिर्फ खरीदारी नहीं होती, वो एक एहसास होता है—त्यौहार आने की आहट, रिश्तों की गर्माहट और यादों की मिठास।

नवरात्रि से पहले की वो शामें… जब हर दुकान सजती थी जैसे कोई दुल्हन। सफाई चल रही होती थी—दुकानों के बाहर पानी डाला जाता, झालरें टांगी जातीं, और हर कोना चमकता था। छोटे ठेले वाले से लेकर बड़े शोरूम वाले तक, सब अपने-अपने तरीके से त्यौहार का मतलब समझा रहे होते थे।

Gupta Uncle की पूजा सामग्री की दुकान पर भीड़ लगी रहती थी—अगरबत्ती, नारियल, चुनरी, और वो छोटी सी घंटी जो हर साल नई ली जाती थी। Vajpai Chacha की कचौरी की खुशबू बाज़ार में फैल जाती थी, और हम बच्चे बहाने से वहीं रुक जाते थे—“बस एक खा लूं?” और Amma, जो हर साल ना जाने कितने फूल मुफ्त में दे देती थीं—“बिटिया के लिए है, माता रानी को चढ़ाना है।”

Khan Chacha, जिनकी इलेक्ट्रिक सामान की दुकान किसी जादूघर से कम नहीं थी। पुराने पंखे, टूटी झालरें, और ढीले तार—सबमें वो फिर से जान डाल देते थे। उनके हाथों से निकली चीज़ें जैसे त्यौहार के लिए फिर से तैयार हो जाती थीं।

ये सब सिर्फ लोग नहीं थे, ये हमारी ज़िंदगी के मील के पत्थर थे। आज भी जब बाज़ार की रौनक देखती हूँ, मन समयचक्र में पीछे चला जाता है… जहाँ त्यौहार सिर्फ पूजा नहीं, एक पूरा अनुभव था—सफाई, स्वाद, श्रद्धा और अपनापन।

आज के शहरों के शॉपिंग मॉल्स में ये बातें कहाँ? वहाँ रोशनी तो है, लेकिन वो अपनापन नहीं। वहाँ डिस्काउंट है, लेकिन वो दादी की negotiation वाली मुस्कान नहीं। वहाँ AC है, लेकिन वो बाज़ार की गरमागरम कचौरी की खुशबू नहीं।

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