1990 के दशक का अहमदाबाद। एक साधारण मध्यमवर्गीय घर। घर में सफेदी किए हुए फर्श पर बिछा पुराना चादर, जिसके कोनों पर हल्दी के निशान थे। सुबह-सुबह पापा पुराने झोले में बाजार से लाए थे—मिट्टी का कलश, नारियल, आम के पत्ते, और एक छोटी सी तुलसी की माला। झोले में थोड़ी धूल भी थी, जैसे शहर की भागदौड़ भी साथ आई हो।

अम्मा ने 5 बजे उठकर तुलसी को जल दिया, फिर रसोई में चूल्हा जलाया। कलश स्थापना से पहले उन्होंने स्टील की थाली में चावल बिछाए, बीच में हल्दी से स्वस्तिक बनाया। हर क्रिया में श्रद्धा थी, हर मंत्र में एक पुरानी याद।
👣 उस दिन का स्वाद: “केसर-बादाम दूध” — जो सिर्फ नवरात्रि के पहले दिन बनता था। अम्मा रातभर बादाम भिगोती थीं, सुबह सिलबट्टे पर पीसती थीं। केसर को गर्म दूध में घोलतीं, और जब दूध उबलता, तो पूरे घर में एक मीठी सी खुशबू फैल जाती—जैसे बचपन की कोई भूली-बिसरी याद फिर से लौट आई हो।
“कलश में सिर्फ जल नहीं, यादों का समंदर था— अम्मा के हाथों का स्वस्तिक, पापा की थैली की मिट्टी, और दूध में घुला केसर, जैसे बचपन का रंग।”
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